सोम प्रदोष व्रत का महत्व: जानें क्यों खास माना जाता है यह व्रत, भगवान शिव की आरती, पूजा का धार्मिक महत्व और शुभ फल
Som Pradosh Vrat Ka Mahatva: जानें सोम प्रदोष व्रत का धार्मिक महत्व, भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा का विशेष फल, प्रदोष काल का महत्व, शिवलिंग अभिषेक, 'ॐ नमः शिवाय' एवं महामृत्युंजय मंत्र का महत्व, भगवान शिव की आरती और सोम प्रदोष व्रत से जुड़ी प्रमुख धार्मिक मान्यताएं।

सोम प्रदोष व्रत का महत्व: जानें क्यों खास माना जाता है यह व्रत, भगवान शिव की आरती और पूजा का धार्मिक महत्व
सनातन धर्म में प्रदोष व्रत भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना के लिए सबसे शुभ व्रतों में से एक माना जाता है। जब प्रदोष व्रत सोमवार के दिन पड़ता है, तो इसे सोम प्रदोष व्रत कहा जाता है। सोमवार स्वयं भगवान शिव का प्रिय दिन है, इसलिए इस दिन प्रदोष व्रत का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सोम प्रदोष के दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक भगवान शिव की पूजा, व्रत, अभिषेक और आरती करने से जीवन के दुख-दर्द कम होते हैं, परिवार में सुख-शांति बनी रहती है और शिव कृपा प्राप्त होती है। हालांकि, ये मान्यताएं धार्मिक आस्था पर आधारित हैं।
सोम प्रदोष व्रत का महत्व
सोम प्रदोष व्रत केवल उपवास का दिन नहीं, बल्कि आत्मसंयम, भक्ति और सकारात्मक जीवन जीने की प्रेरणा देने वाला पर्व भी है। मान्यता है कि प्रदोष काल में भगवान शिव और माता पार्वती अपने भक्तों की प्रार्थना सुनते हैं और उन पर विशेष कृपा बरसाते हैं।
धार्मिक दृष्टि से इस व्रत का महत्व इसलिए भी अधिक माना जाता है क्योंकि—
भगवान शिव और माता पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर करने की प्रार्थना की जाती है।
परिवार में सुख, शांति और समृद्धि की कामना की जाती है।
वैवाहिक जीवन में प्रेम और सौहार्द बढ़ाने की मान्यता है।
मानसिक तनाव कम करने और आत्मिक शांति प्राप्त करने का यह एक आध्यात्मिक अवसर माना जाता है।
भगवान शिव की भक्ति से व्यक्ति में धैर्य, संयम और सकारात्मक सोच विकसित होती है।
सोम प्रदोष व्रत पर भगवान शिव की पूजा का महत्व
सोम प्रदोष के दिन भक्त शिवलिंग का जल, गंगाजल, दूध और पंचामृत से अभिषेक करते हैं। इसके बाद बेलपत्र, धतूरा, सफेद पुष्प, चंदन और भस्म अर्पित की जाती है।
पूजा के दौरान "ॐ नमः शिवाय" और महामृत्युंजय मंत्र का जाप विशेष फलदायी माना जाता है। इसके साथ शिव चालीसा, रुद्राष्टक या शिव पुराण का पाठ भी किया जा सकता है।
भगवान शिव की आरती
ॐ जय शिव ओंकारा, प्रभु जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥
एकानन चतुरानन, पंचानन राजे।
हंसासन गरुड़ासन, वृषवाहन साजे॥
दो भुज चार चतुर्भुज, दस भुज अति सोहे।
तीनों रूप निरखते, त्रिभुवन जन मोहे॥
अक्षमाला वनमाला, मुण्डमाला धारी।
त्रिपुरारी कंसारी, कर माला धारी॥
श्वेताम्बर पीताम्बर, बाघम्बर अंगे।
सनकादिक, गरुणादिक, भूतादिक संगे॥
कर में श्रेष्ठ कमंडल, चक्र त्रिशूलधारी।
सुखकारी दुखहारी, जगपालनकारी॥
ॐ जय शिव ओंकारा, प्रभु जय शिव ओंकारा॥

